कौशाम्बी देश में घृतवाहन नामका राजा राज्य करता था। उसके नगर में एक नगर श्रेष्ठी था ध्रुववाहन उसकी सेठानी का नाम मंथरा था। सेठ १०० करोड़ स्वर्ण मुद्राओं का स्वामी था। उनके एक सुयोग्य कन्या का जन्म हुआ उन्होंने उसका नाम ध्रुवी रखा था। उसमें जैसा नाम तैसा ही गुण था शायद ही कभी किसी सखी ने भी उसे चंचल देखा हो। साध्वी समान उसमें समता थी। उसके खान पान, पहनावा, कक्ष, सुविधाओं के नाम पर भी कभी नाज- नखरे नहीं थे।
दासियाँ उसे देवी समान पूजती थी। माता पिता को उसके विवाह की चिंता रहती थी यह कैसे रहेगी ससुराल में। सन्तान का ज्यादा अच्छा होना भी पालको को असह्य हो जाता है। लोक में रहना है तो लोक के नियमों का पालन करना होता है। वह उसमें एक दम कच्ची थी। उसका एक ही जबाब था गृहस्थ जीवन मजबूरी है आत्म कल्याण जरूरी है। वह किसी को दुखी नहीं करेगी और स्वयं दुखी होगी नहीं। उसके पास संसार दुःख से बचने का रास्ता-राम वाण उपाय ध्रुव स्वभाव के आश्रय से साध्वी दीक्षा लेना था न … अतः उसे कभी चिंता नहीं हुई।
विवाह योग्य होने पर ध्रुववाहन ने एक विप्र परमानंद शास्त्री के हाथों ५ करोड़ स्वर्ण मुद्रा मूल्य का हार देते हुए कहा…. आप देशाटन करते हो… जहाँ कहीं मेरी पुत्री के योग्य वर मिले उसके गले में डाल कर सगाई कर देना।
वर की पात्रता की पहचान आपसे ज्यादा कौन कर सकता है।
सो तो है, अपनी प्रियतम कन्या को योग्य घर में पहुंचाना मेरा दायित्व है। आप चिंता न करो।
चिंता कैसे हो सकती है… आज तक आपके ढूँढे रिश्ते कभी असफल नहीं हुए। मेरा विवाह एवं मेरे पुत्र का सुयोग्य विवाह आपने ही तो कराया है। आपके परिवार के हम सब चिर ऋणी हैं।
यह सब तो आपके दादा श्री विमल वाहन जी के आशीर्वाद का फल है… हमारे पुरखे उनकी कृपा से ही शिक्षित हुए और उनकी कृपा से ही सारस्वत विद्या हमें प्राप्त हुई है।
कीमती हार लेकर कन्या का भाग्य, एव्यं का उद्यम एवं भवितव्य को सहज भाव से खोजने चल पड़े। देशाटन करते हुए एक दिन राजगृही नगरी में पधारे। नगर श्रेष्ठी की परीक्षा हेतु उन्होंने अपने साथ लाये हार को धनपाल सर्राफ को दिखाया वह देखते ही उस हार पर रीझ गया। नीयत भी खराब हो गई, उसने बहाना किया भाई ! यह तो सचमुच कीमती हार है यदि तुम कहो तो मैं इसकी कीमत चुका सकता हूँ परन्तु मेरी सेठानी को यह पसंद आया तो मैं आपको ५ करोड़ स्वर्ण मुद्रा देकर यह हार खरीद लूंगा।
हार की सही कीमत सुनकर विप्र प्रसन्न हुआ। इसके परिवार में कोई योग्य सन्तान हो तो मैं उसके गले में बिना शुल्क लिए ही पहना दूंगा।
वह दूकान पर बैठा हुआ प्रतीक्षा करता रहा। थोड़ी देर में सेठ आया और उसने हार वापिस लौटा दिया बोला मेरी पत्नी को इसका शिल्प कला पसंद नहीं आई है। अतः आप इसे वापिस ले सकते हैं।
विप्र ने हार हाथ में लिया और चलने को ही था कि उसने थैली खोलकर देखि … उसे लगा उसका हार बदल दिया गया है। गजमुक्ताहार का बजन एवं चमक में अंतर दिख रहा था। उसने कहा सेठजी! यह हार वह नहीं है। आपने बदल दिया है।
दोनों में विवाद हो गया।
मेरे घर में ऐसा कोई हार है ही नहीं जो बदल दूंगा। अभी तो लेकर गया हूँ क्या अंतर्मुहूर्त में कोई बदल सकता है? आसपास भीढ़ जुट गई। कोलाहल होने लगा। विप्र अनजान था सब उसका अविश्वास करने लगे। इतना बड़ा नामी सेठ अपने ईमान में वट्टा क्यों लगाएगा।
वह घबराया हुआ राजा श्रेणिक की राजसभा में जा पहुंचा। उसकी गुहार सुनी गई।
सारी बात सुन कर श्रेणिक को समझ में नहीं आया क्या करें। नगर श्रेष्ठी नगर के सर्राफ सभा का अध्यक्ष है यदि उसे दोषी ठहरा दिया तो सारे व्यापारियों में क्षोभ फैल जाएगा और यदि विप्र को दोषी ठहराता हूँ तो यह कलंक सह न सकेगा आत्म घात कर लेगा। इससे विश्व में मेरे न्याय की बदनामी होगी।
उन्होंने थोड़े अवकाश के बाद न्याय देने की बात की तब तक अन्य विषयों पर वार्ता एवं निर्णय लिए जाते रहे। इस बीच एक सेवक के द्वारा अभय कुमार को बुलवा लिया।
अभय कुमार ने सेवक से पूछा- मुझे क्यों याद किया गया है?
रामधुन ने सारा प्रकरण सुनाने के बाद पूछा- मेरे लिए क्या आज्ञा है?
आप एक काम करो सेठजी के घर जाओ और सेठजी को मिलने वाले राज दंड की सुचना दे दो। फिर वह जो करे वैसा मुझे आ कर बताओ।
ठीक है… जो आज्ञा कहकर सिर नवाकर ३ कदम उलटे चलने के बाद वह तेजी से आज्ञापालन के लिए मुढ़कर चला गया। तब तक धनियों के वेश में भी ठग हो सकते हैं और विप्र के वेश में भी झूठ बोलने वाले हो सकते हैं। विप्र का अपयश अभी तक सुनने को नहीं मिला है… फिर भी परीक्षा तो करनी होगी इधर सेठजी भी अपनी प्रभुता ख्याति का दुरुपयोग कर सकते हैं, सही होंगें तो उनका मान देश में और भी बड़ जाएगा।
जिनम जिनम का स्मरण करने लगे…. प्रभु! मैं तो मात्र उदय वश ही करता दिखाई देता हूँ…. मेरा चातुर्य इन कार्यों में नहीं हैं ….मैं तो माता चेलना को पाकर धन्य हो गया हूँ। अकर्ता को अकर्ता देखना ही चतुराई है। वे ध्रुव स्वभाव की मस्ती में खो गये …. आगे जो हो सो हो।
इतने में द्वार पाल ने आकर रामधुन के आने का समाचार दिया।
उत्सुकता से उसे बुलाया और पूछा- क्या हुआ ?
हार दिखाते हुए …यह रहा स्वामी (सफलता की मुस्कान बिखेरता हुआ बोला)
विवरण पूछा….. कैसे मिला यह हार ?
स्वामी ! मैंने कहा सेठजी राज सभा में हैं… उन्होंने जो आज आपको हार दिया है वह मंगाया है। अन्यथा आज उन्हें मृत्यु दंड से कोई न बचा सकेगा। शीघ्र कीजिए… अन्यथा मैं चला
सेठानी जी एकदम घबरा गई… क्या !…. कितनी वार कहा है धोखा देना पाप है। सौ सुनार की तो एक लुहार की भी होती है । आज लुहार की चल गई… जनम भर का यश एक क्षण में चला गया। वह रोकर बोली आप किसी भी तरह उन्हें बचा लेना …. आपको एवं राजा को जितना भी धन चाहिए वह ले लो परन्तु मेरे स्वामी को क्षमा दान करवा देना।
बच जायेंगें न ?
मैं क्या कहता ! न्याय तो न्याय है। राजा के हाथों में ही होता है। आप भगवान का स्मरण करो … कि सब ठीक ठाक हो जाए।
अभय कुमार ने राज दरवार में पहुंचकर पिताश्री को प्रणाम किया। याद करने का कारण पूछा।
श्रेणिक – बेटे ! इन दोनों का न्याय करना है।
अभय ने दोनों से उनका मन्तव्य सुनकर आखिरी वार समय दिया यदि आप अभी भी सही बता देंगें तो क्षमा दान मिल सकता है।
सेठजी – (घबराहट भरे स्वर में) भगवान कसम ….. मैंने कुछ नहीं किया है।
विप्र – (गरजते हुए) मुझे किसी साक्षी की आवश्यकता नहीं हैं। वीतरागी भगवान का स्मरण मैं अपने पापोदय से बचाने के प्रकरण में नहीं करना चाहता हूँ। यदि मैं गलत निकल जाऊं तो आप मुझे म्रत्यु दंड के सिवाय कोई क्षमा न दें।
अभय – (सेठजी की और उन्मुख होते हुए) तुम क्या कहते हो ?
सेठजी – हाय आज मेरा पाप का उदय है… अन्यथा आज तक किसी ने मुझ पर ऊँगली नहीं उठाई।
विप्र (उग्र स्वर में कटाक्ष) ऊँगली नहीं उठाई या गलत काम नहीं किया ?
सेठजी में सही हूँ… किसी से भी पूछ लो।
विप्र – वहां मेरे आपके सिवाय दोनों का ईमान ही था। और कोई था ही नहीं जिससे पूछा जा सकें।
सेठजी – (कुटिल मुस्कान तैर गई) अभी मैं कहीं गया तो नहीं न ? ईमान की कसम खा सकता हूँ… पत्नी से पूछ सकते हैं।
विप्र – मुझे तो न्याय चाहिए महाराज! आपके राज्य में एक अकिंचन विप्र के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए। वह हार मेरा नहीं हैं… लोग मुझ पर कितना भरोसा जताते हैं…. आज से सारे विप्र समुदाय पर से विश्व का विशवास उठ जाएगा। मेरी समाज मुझे जिंदा नहीं देख सकेगी। अकिंचन की सम्पत्ति विशवास ही तो होती है। अन्याय अर्थात विप्र के प्राण हरण मात्र नहीं समस्त विप्र समाज की हत्या समान होगी।
अभय – आपकी पत्नी को बुलाया जाय।
सेठजी – अवश्य (पत्नी तो मेरा उपगूहन ही करेगी सोचते हुए मुस्कुरा दिए)
अभय कुमार ने हार की थैली खोली और उसमें से हार निकालकर विप्र के पास से मिले नकली हार को मिलाया… कोई देखकर नहीं कह सकता था कि इसमें असली नकली हार कौनसा है? लेकिन विप्र की समझ से प्रसन्न हुए वरना आज यह धोका धड़ी ज्ञात ही न हो पाती और हमारे राज्य में ठगी होती रहती और हमें ज्ञात भी न होता ।
बजन एवं चमक देखकर नकली हार अलग ही दिखाई दे गया।
श्रेणिक – यह हार आपके पास कहाँ से आया, कुमार !
अभय – (मुस्कुराकर सेठजी की ओर देखकर)
सेठजी – (हार देखते ही सिट्टी पिट्टी गुम हो गई नजरें झुक गई। चेहरे पर कालिख पुत गई)
श्रेणिक – सब कुछ दूध का दूध पानी का पानी हो गया है।
सेठजी – मुझे क्षमा कीजिए… आप जो चाहे सो धन राशि दंड स्वरूप ले लीजिये… परन्तु ….
श्रेणिक – आपका सारा कारोवार जब्त किया जाता है। आप एवं आपका परिवार देश छोड़कर चला जाय। अथवा तो आपको मृत्यु दंड एवं आपकी सन्तान को न्यायोपारजित धन देकर शेष धन राशि जब्त की जायेगी।… बोलो क्या मंजूर है?
अभय कुमार – महाराज ! मानव जन्म बड़ी दुर्लभता से मिलता है… यदि इन्हें अभी भी पश्चाताप का भाव है तो १ वर्ष तक सारे राज्य में अपनी कहानी सुनाकर लोगों को छल कपट के पापों से बचाबें। और महा श्रमण महावीर के पादमूल में दीक्षा लेकर आत्म कल्याण करें तो इन्हें क्षमा दान करना चाहिए।
सेठजी अभय कुमार के चरणों में भूसात हो गये। श्रेणिक ने अभय कुमार का न्याय सम्मत रख्खा ।
अब सब अभय कुमार के सम्मान में ताली बजाने के साथ उसकी जय जयकार ही कर सकते थे। साधू साधू शब्दनाद से राज सभा गूंज उठी।
श्रेणिक – विप्रदेव ! आपको हमारे राज्य में जो कष्ट उठाना पड़ा इसके लिए हमें खेद हैं….. आपके पवित्र आत्मा को हमारा प्रणाम स्वीकृत करें।
विप्र – मैं आप एवं कुमार के न्याय शीलता का अनुमोदक हुआ। आपका राज्य चिरकाल तक जीवंत रहे। (आशीर्वाद दिया और हार लेकर अभय कुमार की ओर बढ़ा और उसके गले में डालने की अनुमति मांगी) यह हार इस नगर की गरिमा स्वरूप कुमार को ही पुरुष्कार स्वरूप मिलना चाहिए।
श्रेणिक – (सानन्द) कुमार को स्वीकार करना ही चाहिए।
अभय कुमार ने लज्जा से अधो दृष्टी करके पिताश्री का सम्मान रखा। अभय कीमती हार के साथ-२ मनोहारी कन्या ध्रुवी के भी स्वामी हुए।
अंतर में ध्रुव बाहर में ध्रुवी आत्म साहसियों को कुछ भी अलभ्य नहीं रह जाता है।
श्रेणिक ने श्रेष्ठी पुत्रों को योग्य आजिबिका हेतु धन आवास रथ अश्व देकर शेष धन राशि लुटने वालों की सूचि बनबा कर उनमें वितरित कर दी। शेष धन राशि गरीबों के उत्थान में व्यय की गई। ऐसी गंदी राशि को राज कोष में भी नहीं रखा गया।
श्रेष्ठी ने एक वर्ष तक भ्रमण कर सब जगह अपनी पाप एवं उसका फल की कथा सुनाई, लोग सावधान होकर पाप छोड़कर पांच अनुव्रतों का पालन करने लगे। सेठ ने महाश्रमण वर्द्धमान के चरणों में एवं सेठानी ने श्रमणी चन्दनबाला के चरणों में दीक्षा लेकर आत्म साधना करके अपने पापों को अनंत काल के लिए धो लिया।

