(देवनिर्मित हस्तिनापुर असंख्य देवों से रक्षित था और मध्य में विशाल राजमहल के ८४वे खंड के सुंदर सुगन्धित कक्ष की एक मनोहारी वार्ता सुनिये ।)

वातायन’ के निकट झूलते विशाल पट के स्वर्ण रत्नमयी घुंघरुओं की ध्वनि से वातावरण संगीतमय हो रहा था। कलकल करती विशाल नदी ऊंचे पर्वत से गिरती हुई चट्टानों से टकराती हुई स्वर उत्पन्न करती, तो कानों में अमृत सा घोलती-सी भासती थी। मनोहारी वनों से चन्दन के वृक्षों से स्पर्शित पवन मानो नदी का साथ देती हुई भावी तीर्थनाथ का स्पर्श करने का बहाना ही ढूँढ़ रही हो, ऐसा लग रहा था।

महल के झरोखों से हस्तिनापुर के सुंदर पर्वत एवं वन दिख रहे हैं।

सिद्धालय में तो वह निरर्थक ही रह जाने वाली जो है। अभी जी भरकर उन्हें श्वासोच्छवास देने का अहम कर ले। वैसे आयुकर्म की तरह आखिर वह भी तो १० प्राणों में से एक प्राण ही है न!

अपने स्वामी के अंक में कौन सौभाग्यवती न इठलायेगी? फिर वह तो पटरानी थी। श्रावण का महीना और स्वर्ण रत्नमयी हिंडोले पर स्वामी का साथ। पवन दोनों की केशराशि उड़ा रहा था। दोनों आनंद में डूबकर चर्चा में निमग्न थे। राजन मात्र अपना उदय का ऋण उतार रहे थे अथवा तो स्वांग पूरा कर रहे थे । समय होते ही संसार मंच से उतरकर मोक्ष चले जायेंगे। ऐसे में वे किसी से राग कैसे करें ! वह भी मात्र स्वांग ही तो कर रहे हैं। चारों ओर देखो तो कुछ को इस की बात खबर है, तो शेष अनेकों भूले हुए भगवान भी थे। अपने स्वांग को ही आपरूप मानकर मग्न होकर झूठे सुख की कल्पना कर हस/ रो रहे थे। किस रानी, किस पुत्र को आत्मा न देखूं; सब ही तो आत्मा हैं। कहीं कोई समस्या नहीं दिखाई देती है, क्योंकि

सब ही द्रव्य हैं। व्यवस्थित स्वरूप का धारी ही तो द्रव्य कहलाता है। इस विश्व में कोई काम ही शेष दिखाई नहीं देता है।

पटरानी (उलाहना देते हुए): “क्या आपको मेरी कोई चिंता नहीं हैं ? आप तो मोक्ष ….”

राजन : “मुझे मेरी ही चिंता नहीं, तो तुम्हारी कैसे करूं? फिर क्या तुम द्रव्य नहीं हो । तीनकाल व्यवस्थित हैं। इसमें कुछ करने की तो छोड़ो, सोचने की भी गुंजायश नहीं है। आज तुम जो कुछ भी हो, उसमें भी तुम्हारे मन वचन काय के कृत्य का कोई योग ही नहीं है। जब बिना सोचे, बिना मांगे हम सहज मिल गये हैं। अनादि से बिन मांगे ही गतियाँ मिलती रही हैं, तो मोक्ष भी योग्यता पाकर सहज हो जाएगा।”

पटरानी (फिर आग्रह करती सी बोली): “परन्तु… हमें मोक्षमार्ग के बारे में प्रवचन/कक्षा/स्वाध्याय कुछ तो कराइए?”

राजन (प्रतिप्रश्न कराते हुए): “क्या साथ रहकर तुम यह सब नहीं जानती हो ?”

(पटरानी अनुत्तरित रह गई, नाथ की गंभीरता और आनंद में भंग डालने का साहस उसमें नहीं रह गया था।

पटरानी (खीजते हुए): “तो फिर आप दिव्यध्वनि किसके लिए खिराओगे ?”

राजन (मंद मंद स्मित करते हुए): “मैं बोलने, न बोलने वाला न कभी था, न हूँ। जो होगा वह विश्व का परिणमन मात्र होगा। भव्य जीवों के भविभागन यथासमय होने वाले कार्य को करने रोकने में भी मैं सर्वथा असमर्थ हूँ। मैं तो मात्र ज्ञाता हूँ और रहूँगा।”

पटरानी (तर्क देकर बात आगे बढ़ाने की गरज से) : “आपकी देशना सुनने से वंचित जीव दुर्गतियों में चले जायेंगे। यह तो दिया तले अँधेरा जैसी बात होगी।”

राजन : “सभी जीव योग्यता प्रमाण मार्ग पा ही लेते हैं। उनकी चिंता करना निरर्थक है।”

पटरानी : “आपको जिन शासन की प्रभावना को आगे बढ़ाना है और आप निर्विकल्प हो । कुछ करोगे तब ही तो आपका नाम होगा। लोग अभी से आपकी जयजयकार करने लगेंगे।”

राजन : “अभी धर्मनाथ भगवान का शासन चल रहा है न! मेरे करने को अभी कुछ नहीं है और कल भी कुछ न होगा। क्योंकि वह सब होना है। जयजयकार मेरी कोई कर ही नहीं सकता, क्योंकि मेरे समकक्ष पवित्र हुए बिना मुझे कोई पहचान ही नहीं सकता । और जो पहचानते है वे जयजयकार करते नहीं है। आपको मेरे अपयश की चिंता है परन्तु अज्ञानियों के कथन एवं विचार को लक्ष्य करके यश-अपयश कर्म काम नहीं करता। इस तरह होने

लगे, तो कभी यश प्रकृति का उदय देखने को ही नहीं मिल पाये। जीव का तो होता ही है, कर्मों का परिणमन भी ‘पर’ से अति निरपेक्ष होता है।”

“देखो, अज्ञानी वीतरागी भगवान को देख कर खूब जयजयकार करते हैं और कहते हैं, शीतलनाथ शीतलता के दाता हैं। कल मेरे नाम पर भी कहेंगें शान्ति चाहिए तो शांतिनाथ की पूजा करो। तो क्या मेरा यश हो जाएगा !!”

“यश अपयश का विकल्प अज्ञानियों को ही सताता है। ज्ञानी तो निर्विकल्प ही होते हैं। अज्ञानियों को समझाने के लिए नाना प्रकार से कथन किया गया है। उन्हें परमार्थ से घटित नहीं किया जा सकता । घटित करेंगें तो अपयश को ही यश मानना पड़ जाएगा और असली यश तो मात्र ज्ञानियों से कहने सुनने को मिलेगा?” (प्रतिप्रश्न करके समझाने का प्रयास कराते हुए)

पटरानी (अपनी समझ सच्ची करते हुए): “यह कैसे सम्भव है ? जब आप यथेच्छ काम-भोग आदि में मेरा साथ देते हुए दिखते हैं, तो मोक्षमार्ग में संयम, नियम, स्वानुभव आदि विषय में प्रतिदिन कुछ तो चर्चा की ही जा सकती है…..सर्वार्थसिद्धि में ३३ सागर हो सकती है, तो यहाँ का काल तो अत्यल्प ही है, कुछ तो लाभ लेने की अपेक्षा जाग ही जाती है।”

राजन:

“होते हुए को मेरा कार्य समझोगी तो यह प्रश्न कभी ख़त्म ही नहीं होगा।”

पटरानी मुस्कुरा देती है।

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